गोपारचन


छुट्टी में था इसलिए आपको कुछ नया नहीं दे पाया इस बीच एक एसएमएस मिला और सोचा की चलो एसएमएस से ही बात शुरू करता हूँ । दो प्रकार के एसएमएस का चलन खूब है एक तो भक्तिमय सूरदासों के लिए और दूजा हम जैसे अभागों के लिए। एक और एसएमएस का क्लास है प्रेम वालो का, लेकिन अपनी वहाँ पहुँच न हो पाने के कारण उस बारे में आपको ज्यादा जानकारी नहीं दे सकता । उस एसएमएस के बारे में जान ले जो मुझे मिला संता- मुझे संस्कृत सीखा।बंता- क्यों? संता-देवताओं की भाषा है स्वर्ग मेम जरूरत पड़ेगी। बंता- अगर नर्क गया तो बंता- पंजाबी तो आती ही है। मतलब तो आप समझ रहे होंगे की इसमें कोई ऐसा है जो पंजाबियो के बरक्स अपने को श्रेष्ठ बताना चाहता है। हमारे उत्तर का मिथकीय व्यंग संसार पिछले कई सालों से पंजाब हरियाणा के लोगो पर आश्रित है। पिछली ब्लाक बस्टर थ्री इडियट्स में आपने देखा होगा कि कैसे हिरानी भाई ने ‘गाड़ी गई तो गई कित्थे कह कर’ निकल लिए थे और अपने सीधे पंजाबी भाइयों कामजा ले लिया। या ऐसी ही कई फिल्में होंगी। जो आपके दिमाग में इस पोष्ट को पढ़ कर जिंदा हो जाएंगी। दरअसल यह उत्तर की ही बात नही भाई सभी जगह के माध्यमों में कुछ खास तरह के क्षेत्र और लोग होते हैं जो व्यंग का विषय बनते हैं। अगर बात महाराष्ट्र की करे तो पाएंगे कि पहले दक्षिण के लोग व्यंग का विषय होते थे । उनके साउथ इंडियन टोन वाली हिन्दी फिल्मों के डॉयलोग ने एक लंबे समय तक दर्शको का मनोरंजन किया। बाद में उनकी जगह यूपी और विहार के भैया लोगो ने ले लिया। मोटे डील-डौल वाले चरित्र जो लूँगी और कंधे पर रखे कलकतीया गमछे में नजर आते थे। अब दक्षिण कि क्या स्थिति है मुझे विशेष नहीं पता। पर मेरा अंदाजा है कि वहाँ के लोगों के व्यंग का विषय हम उत्तर वाले लोग हैं, एक बार मैं बेंगलोर से आ रहा था। मेरी सहयात्री एक केरल की लड़की थी जो इलाहाबाद के एग्रीकल्चर संस्थान में पढ़ाई करती थी। काफी बात हुई उसने अंत में कहाँ कि उत्तर में तो कुछ मिलता नहीं there is no banana tree no coconut tree and no idalee-dosaa-saambhar. उसकी बात से लगा की यह हमारा मज़ाक उड़ा रही है।मुझे चिढ़ हुई जबकि लड़कियों के मामले में उनसे असहमत होने के बावजूद उनकी बातों का समर्थन करता रहता हूँ अब आप यहाँ बाल की खाल न निकालने का प्रयास करेमेरा यहास गवाई पैन जाग गया और मैंने भी कह मारा तुम्हारे साउथ में भी no banyan tree no mahua tree . मुझे एहसास हो गया कि भाई लोग के यहाँ हम मज़ाक के पात्र होते हैं। चलो कोई बात नहीं अगर आप के पास भी कुछ किस्से हो तो anuj4media@gmail पर हमारे साथ शेयर करे।

लंबे इंतजार का समय खत्म हुआ और हम अपने वायदे के अनुसार महाकवि समीर की रचना संसार पर समर्थ आलोचक दिलीप भाई की टिप्पणियों को लेकर हाजिर हो रहे है xyz भाइयों की उपस्थिती में।

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अनुवाद विद्यापीठ के अधिष्ठाता और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के पूर्व कार्यकारी कुलपति प्रो. आत्म प्रकाश श्रीवास्तव का हृदय गति रूक जाने के कारण देहांत हो गया। हम ‘गोपरचन’ परिवार की ओर से शोक प्रकट करते हैं।


पुरातत्व का अपना महत्त्व होता है। गाव-जवार की चौपाल से लेकर राजे राजवाडो के दरबार तक में इसका बराबर दबदबा रहा है। यह कभी-कभी अदालतों के फैसले पर भी अपना विशेष रोल दिखाती मिल जाएगी। किसी मेस या घर में पति-पत्नी के आपसी झगड़ों में, जहां पत्नीयां पतियों को ताने मारती मिल जाएंगी कि ‘ये तो मैं आ गई नहीं तो तुम्हारे सात पुस्त में क्या होता आया है हमे सब पता है’ या ‘ये तो हमारे बाप ने तुमको इतना दे दिया नही तो पता है कि यहाँ भूजी-भांग भी नसीब नही होती थी’। पूरातात्विक अभिलेखों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। ग्रेजुएशन के दिनों में हमारे गुरूजी हुआ करते थे, किस्से सुनने और सुनाने के शौकीन। वे एक बार किस्सा कह रहे थे कि ‘मेरे पड़ोस में आजकल डेली औरते इकट्ठा होकर पुरातात्विक सर्वेक्षण ( आपरेशन कहा जाए तो ज्यादा बेहतर होगा) करती हैं । इस चक्कर में उनकी बातें लड़ाई तक पहुँच जाती हैं किसके परिवार की लड़की किसके साथ भागी और पड़ोसी के यहाँ किसका मर्द धरा गया जैसे किस्से वहाँ सुनने को मिल जाएंगे। ऐसी बहसों का अपना मनोविज्ञान होता है और इसमे शामिल होने के लिए आपको चाहिए की आप पुरातात्विक ज्ञान से लैस हो। बचपने में मेरी माँ भी हमेसा ही घर के पुराने किस्से सुनाती कि कैसे हमारी दादी ने हमारे माँ-बाप पर अत्याचार( वैसे यह कुछ ज्यादा कठोर शब्द है ऐसा था नहीं यह तो सास-बहू के विमर्श का हिस्सा मात्र है) किया। यह पूरातात्विक ज्ञान बढ़ाने के लिए जरूरी था। ताकि भविष्य में परिवार में होने वाले विमर्शों में हम ‘कोट एन कोट’ अपनी बातों को रख सकें। हमारे यहाँ गाव में प्रधानी के चुनाव को लेकर भी पूरा चिजे बहुत महत्त्वपूर्ण साबित होती आई हैं। पिछले चुनाव की बात है, हमारे गाव में लल्ल्न चचा प्रधानी के चुनाव में नामदेव के यहाँ वोट मांगने गए थे। नामदेव को अब तक मैं उनके अच्छे मित्र के बतौर लेता था। पर जो वाकया नामदेव ने लल्लन चचा के साथ किया उससे पूरा गाँव सन्न रहा गया। एक बारगी तो किसी को विश्वास ही नहीं हुआ। दरअसल हुआ यू कि लल्लन चचा उनके घर जाकर उनसे वोट मांगने की अपील करने लगे। नामदेव तो आपे से बाहर आ गए और कहा कि ‘ मै तुम्हें कैसे वोट दे सकता हूँ तुम्हारे चाचा ने हमारी बुआ को भगाया था तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमारे यहाँ आने की’। हमेसा की तरह इस बार भी भगाने वाला अगड़ी जाति का और भागने वाली पिछड़ी जाति थी। परिणाम यह हुआ कि एक पुरातत्व के कारण लल्लन चचा को एक खास विरादरी ने वोट नहीं दिया और बेचारे लल्लन चचा को चुनाव मुँह की खानी पड़ी। पुरातत्व की इस पटखनी से चाचा की कमर अभी तक टूटी हुई है। ऐसा बहुत बार देखने को मिल जाएगा ये सब बाते अक्सर गाँव में चुनाव के समय ही सुनाई देती है। जहां पुश्तों की बातों के आधार पर फैसला किया जाता है । बात निकली है इसलिए बतला रहा हूँ आपने भी देखा होगा की अयोध्या में asi की रिपोर्ट के आधार पर फैसला आता है और हमारी मेस में भी तीन महीने के बाद मेस रजिस्टर का महत्त्व लोगो को समझ में आ रहा है। एक भाई को तीन महीने बाद हिसाब में दिक्कत आई उनका मानना था की जो हिसाब है वो ठीक नहीं है तो इसकी जांच करने के लिए पुराने अभिलेखों की जरूरत पड़ी। खोजा जाने लगा की हमारा हिसाब वाला अभिलेख कहाँ है खैर मामला निपटाया जा चुका है पर मुझे लगा कि आपको भी आगाह कर दू की भाई पुरानी चीजों को सभाल कर रखने का वक्त है हो सकता है कल आपको उसकी जरूरत पड़े और पता लगे की वो चीज आपके पास है ही नहीं ।

अनुज


     अनुज शुक्ला-

     पूर्वी उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूँ अबकी जून की छुट्टियों में घर पर था। उसी दरम्यान एनडीटीवी पर रवीश की रिपोर्ट देखी जो मौसम विज्ञान से संबंधित थी।  रिपोर्ट मौसम विज्ञान की तकनिकियों पर थी जिसमे रवीश ने बतलाया की ‘स्काइमेट’ कंपनी जो मौसम आधारित सूचनाओं का व्यवसाय करती है -उसके माध्यम से कैसे कृषि और उद्योग को लाभ प्राप्त  हो रहा है। भारी गर्मी के बीच कयी  समाचार प्रदाता माध्यम, वर्षा के संबंध में अपनी रपटे लगातार प्रसारित कर रहे थे। कृषि विभाग भी अच्छी बारिश के संकेत से लब्बोलुआब था।

     शायद सूचना के प्रवाह का ही असर था कि किसान, बारिश के अच्छे संकेत को देखते हुए भारी मात्रा में धान की नर्सरी लगाने को प्रेरित हुआ । मेरे गाँव के किसानों ने भी बड़े पैमाने पर विदेशी प्रजाति की महँगी धान की नर्सरी तैयार की और अब उन्हें पूर्वघोषित बरसात का इंतजार था, पर दुर्भाग्य कि यह बड़े इंतजार में तब्दील हो गया। घर बात करने पर पता चला कि बरसात न हो पाने के कारण धान की नर्सरी नष्ट हो गयी। किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा।

     मुझे आश्चर्य हुआ कि तकनीक के इतने विकास के बावजूद हमने ऐसी कोई प्रणाली विकसित नहीं कि जो हमें ऐसे अवसरों से सावधान कर सके ।  बहरहाल हमारे पास ऐसे अवसर थे भले ही उनकी तकनीक, वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरी न उतरे। लोक परंपरा में खेती-किसानी से जुड़ी कई श्रुतियां पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं, किन्तु जैसे-जैसे सूचना तंत्र का विकास होता गया वैसे-वैसे लोक से ये श्रुतियां भी गायब होने लगी। कभी उत्तर भारत के जो किसान इन श्रुतियों को ध्यान में रखकर खेती विशेष का चुनाव करते थे, अब उनकी निर्भरता त्वरित सूचना माध्यमों पर हो गयी है। लेकिन अगर प्रासंगिकता के लिहाज से देखा जाए तो वे अभी भी जायज प्रतीत होती हैं। जिस समय सूचना एजंसिया अच्छे बारिश का हवाला दे रही थी उस समय मौसम के लिहाज से श्रुति परंपरा के लोक कवि ‘घाघ’ की इन पंक्तियों “पूरब दिसि की बहे जो बाई, कछु भीजे कछु कोरो जाई” का ध्यान किसानों ने नहीं रखा। हवा के मिजाज के आधार पर घाघ ने किसानी से संबंधित  कई लोकोक्तियां गढ़ी हैं जो दशकों तक प्रचलित रही।  वर्षा आश्रित कृषि के कारण, मौसम की सूचना का भारत की खेती में अभूतपूर्व स्थान रहा है।  इस साल वर्षा के संबंध में  घाघ की ये पंक्तिया ‘ जै दिन जेठ बहे पुरवाई, तै दिन सावन धूल उड़ाई’  अक्षरश: सच साबित हुई हैं कम से कम पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के मानसून की सूचना, माध्यमों की घोषित मौसम रपटों का मखौल उड़ा रही हैं।


यह कविता रत्नेश भाई ने मेल की है जिसे आप पाठको के सम्मुख रख रहा हूँ,रत्नेश जी मीडिया के शोधार्थी है और बराबर रचनात्मक लेखन करते रहते है उनसे ratnesh.media@gmail पर संपर्क किया जा सकता है। गोपारचन को किसी भी प्रकार के सलाह के लिए आप anuj4media@gmail.com  स्ंपर्क कर सकते है
जीवन की भूल भुलैया में
यादों के झरोखे में
झाककर देखा तो, याद आती हैं कुछ भूलें।
वाह क्या याददश्त है,
जो भूल को याद करती है।
यह भूल भी अजीबो-गरीब है,
पहले तो हो जाती है, फिर याद आती है।
वो भूल जो मन के अदालत में
खुद को ही मुजारीं करार कर दे,
एक ऐसी अदालत जिसमें, मुजरिम- वकील और
जज स्वयं अभियुक्त हो
क्या सजा निर्धारित कर पाएगा?


गोपा देश के कोने-कोने से आये स्वघोषित बुद्धिजीविओं का गढ़ बनता जा रहा है. विश्विद्यालय कि सबसे समतल जगह पर मौजूद एक विभाग में साहित्यिक संगम नगरी से उच्च अध्ययन करने आये हमारे बुद्धिजीवी महोदय अपने को अन्यान्य विषयों का ‘पंडित’ बताते हैं .हिंदी को उन्होंने ‘आजीविका की मजबूरी’ के तहत चुना है ,ऐसा गोपा सूत्रों कि आपसी बातचीत से पता चला है . आधुनिक विमर्शों में भी आपका उतना ही हस्तक्षेप है जितना आप करने के प्रयास में कर नहीं पाते हैं. आप चरित्र से उच्च कोटि के हैं. वर्धा की चिलचिलाती धुप में आप कई रंगीन छतरियों के नीचे देखे जा सकते हैं. मासूमियत और भोलेपन की जन्मजात कला को आप अपने अकादमिक जीवन में सुधार के लिए प्रयुक्त करते हैं .किसी भी बात को पीछे से दुहराकर महफ़िल लूट लेने कि ख्वाहिस आपकी कातिलाना अदा का शानदार नमूना है. आप नित्यप्रति सेविंग कर अपने आप को तरोताज़ा रखते हैं ताकि ‘नेगोसिएसन’ की कठिन प्रतिस्पर्धा में अपने को सफल बना सकें. आपकी ‘हिंदी’ ‘देहाती शब्द भण्डार’ से लबरेज़ होने के कारण अत्यंत ही भावपूर्ण हो गयी है सही अर्थों में आपही को सस्यूर का प्रतिनिधी कहा जा सकता है. आप बाल मुकुन्द गुप्त की हिंदी के मानकीकरण कि तमाम कोशिशों को धता बताते हुए ‘मैंने निज शैली अपनाई’ के हिशाब से क्लास और सभा में बोला करते हैं. पाठकों कि सुविधा के लिए कुछ उदाहरण दे रहा हूँ .हालाँकि हिंदी के क्षेत्र में आपके योगदान को कुछ उदाहरणों में नहीं समेटा जा सकता .
१- आप शब्दाभाव कि स्थिति में हर वाक्य से पहले ‘जो है’ जैसे संयोजक वाक्यों का प्रयोग धड़ल्ले से करते हैं.
२- किसी भी बात को आप ‘अगर देखा जाय तो एक तरह से इसमें’ जैसे महत्वपूर्ण और प्रिय वाकया से शुरू करते हैं.
३-‘ फिर से कहिये’ जैसे कठिन वाक्यों को आप ‘फुन से कहिये’ जैसे सरल वाक्यों में बदलने कि कला में सिद्धहस्त हैं.
एक और महत्व पूर्ण जानकारी के अनुसार आप कोमंवेअल्थ नगरी में भी कुछ साल बिता चुके हैं .आप जैसे महत्वपुर्ण बुद्धिजीवी और कुशल भाषाविद कि उपश्थिति से गोपा अभीभूत है.
यह लेख एक सज्जन ने मुझे मेल की है, मैं उनके सहयोग के लिए उनका आभारी हूँ- माडरेटर

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अभी हाल ही में हमारे एक मित्र दिल्ली की हवा खाकर आएं हैं, किसी तरीके उन्होंने खुद को कॉमन वेल्थ की नरकीय यंत्रणा से बचाया है लेकिन उनके चेहरे पर वह खास तरह की चमक देखी जा सकती है जो किसी कॉमन वेल्थ जैसे आयोजनों के मलाई से जुड़ी हुई चमक होती है। अब आप इस पचड़े में ज्यादा न पड़े, मैं उनके वैष्णवी व्यक्तित्व को देखते हुए, इसे ‘तत्व’ की संज्ञा देना पसंद करूंगा। काफी दिनों बाद महोदय के दिल्ली पहुंचने पर उनके मित्र, उनकी काया सुधार अभियान पर जुट गए और समवेत स्वर में कहा- तो ‘वैष्णव’ क्या पियोगे ? भाई आपको वैष्णव के साथ तत्व थोड़ा अटपटा लग सकता है लेकिन है यह बहुत मजेदार। ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए पीड़ पराई जाने रे’ इन लाइनों ने और खासतौर से वैष्णव शब्द ने उन्हें भीतर से बदल दिया है और अब  ‘वे’ पहले वाले ‘वो’ नहीं रहें।

       दिल्ली में लगातार खाते-पीते, उठते-बैठते – वैष्णव का इस्तेमाल होता रहा। अब जबकी वे यहाँ आ चुके हैं उनकी वही आदत बनी हुई है। जैसे- सुबह उठते ही – “सुप्रभात वैष्णव” रास्ते में कहीं मिलने पर – “ कैसे हैं वैष्णव” लड़कियों के साथ बात करने पर ”ये ठीक नहीं वैष्णव” फिल्म देखते हुए “तो आप भी बिगड़ गए वैष्णव”( रात को 11 बजे के बाद  जब मैं टीवी देखता हुआ पकड़ा जाता हूँ तो वे अपने मनपसंद जुमले के साथ जरूर टोकते हैं) ‘यह वैष्णव संस्कृति का पतन है, वैष्णव नष्ट हो जाओगे’

       आजकल युवाओं का अखबार से जुड़ाव शनिवार के सप्लीमेंट, नवरंग और क्रिकेटिया खबरों के कारण होता है (यह बात मैं अपने छात्रावास के आधार पर कह रहा हूँ)। इस शनिवार को नवरंग पढ़ते हुए उन्होने मुझे पकड़ लिया……  वैष्णव, पढ़ो……….पढ़ो…………….खूब पढ़ो, पर थोड़ी लाज बचा कर रखो…. और भी बहुत कुछ है….

वैष्णव बाबा तेरी महिमा अपरंपार है…..आप ही मुझे मोक्ष प्रदान कर देवे….       

राकेश अंश-

rakeshansh90@gmail.com

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