गोपारचन

लेखक पुरालेख


अनुज शुक्ला –
पिछले कई दिनों से छत्तीसगढ़ राज्य डा.विनायक सेन को लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बहसों के केंद्र में रहा है। राज्य की मौजूदा प्रवृत्तियों के आधार पर वहां लोकतंत्र को लेकर तमाम तरीके की आशंकाएँ व्यक्त की जा रही हैं। दस साल पहले कुछ बुनियादी जरूरतों में सुधार को लेकर राज्य गठन की प्रक्रिया को बल दिया गया था और यह माना गया था कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों की लगभग आधी आबादी वाले इस राज्य में नए राज्य बनने के बाद, वर्षों-पर्यंत चली आ रही समस्याओं का समाधान कर लिया जाएगा। समाधान तो संभव नहीं हुआ लेकिन वैश्वीकरण की प्रक्रिया में विकास के नाम पर एक राज्य के शैशवी सपनों और कौमार्य का गला घोट दिया गया। उनकी आँखों के सामने ही कार्पोरेटीय पिट्ठुओं के माध्यम से पूरी की पूरी सभ्यता को नष्ट करने का दुस्साहसी उपक्रम किया जाने लगा। यह निश्चित ही सत्य माना जाएगा कि पिछले कई दिनों से राज्य नक्सलवाद को लेकर समस्याग्रस्त रहा है। लेकिन क्या नक्सली हिंसा के इस सत्र में सारा दोषारोपण पक्ष विशेष पर किया जाना न्यायसंगत होगा, जबकि ऐसे कोई आधार नहीं मिलते कि राज्य के ऊपर लगे आरोपों को भी बेबुनियाद साबित किया जा सके? बहरहाल एक राज्य का यह अपना राजनीतिक मामला हो सकता है। लेकिन देश के अन्य हिस्सों की हजारो-हजार जनता यह अवश्य जानना चाहेगी कि वाकई वहां हो क्या रहा है? छत्तीसगढ़ की स्थिति और पुलिसिया आतंक का अंदाजा एक पत्रकार के इस बयान से लगाया जा सकता है कि ‘वहां जाकर सारी जिंदगी जेल में नहीं गुजारनी है’। अभी हाल के दिनों में राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने एक प्रेस कान्फ्रेंस और बीबीसी को दिए साक्षात्कार में यह बयान दिया कि ‘ मैं हर हाल में राज्य में शांति का पक्षधर हूँ’।
छत्तीसगढ़ एक विपन्न राज्य की भयावह कहानी है जहां आंकडों के गोलमाल के द्वारा देश-विदेश के दूसरे हिस्सों में भ्रामक सूचनाओं का सरकारी प्रसार किया जा रहा है। उदाहरण स्वरूप रमन सिंह का यह विज्ञापन देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपवाया गया कि ‘छत्तीसगढ़ में पाँच सालों में विकास दर 10.5 फीसदी दर्ज की गई जो मोदी के अतुल्य गुजरात से भी ज्यादा है’ और एक अनुमान में कहा गया है कि यह 2011 में 11.47 फीसदी तक पहुँच जाएगा। कृषि दर भी 2.3 के राष्ट्रीय दर की अपेक्षा 4.7 फीसदी है जो अगले साल छः फीसदी के जादुई आंकड़े को पार कर जायेगी। इन आंकडों पर दूसरी अन्य सरकारी और गैर सरकारी सांख्यिकीय संस्थाएं अट्ठहास कर रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड व्यूरों के अनुसार 2009 में छत्तीसगढ़ में 18011 पात्र किसान आत्महत्याएँ हुई हैं, जो विदर्भ के पात्र किसान आत्महत्याओं से भी ज्यादा हैं। इन आंकडों को लेकर राज्य सरकार और राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड व्यूरो के बीच मतभेद भी व्याप्त है। जहां विशेषज्ञों का यह मानना है कि राज्य में आत्महत्याओं को दर्ज करने की पुलिसिया तकनीकी के कारण ये काफी कम मात्रा में दर्ज की जा सकी हैं जबकि राज्य में इससे कहीं ज्यादा आत्महत्याओं से इंकार नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर छत्तीसगढ़ प्रशासन अपने बयानों के द्वारा यह आरोप चस्पा कर रहा है कि ये आंकड़े भी पूर्वाग्रही हैं। मानो बहस का यह मुद्दा नहीं है कि समस्या का समाधान कैसे किया जाय बल्कि यह साबित करने का प्रयास हो रहा है कि तुम्हारे यहां के मुक़ाबले हमारे यहां समस्या कम है। ठीक वैसे ही जैसे महिला उत्पीड़न के मामलों को लेकर दिल्ली और उत्तर प्रदेश परस्पर एक दूसरे को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं। चलिए एक क्षण के लिए यह मान लिया जाय कि ये आंकड़े विरोधाभास लिए हुए हैं लेकिन काबिलेगौर है कि जब राज्य में कृषि विकास की राष्ट्रीय दर 4.7 फीसदी है तो आखिर वे कौन से कारण हैं जिनसे 18011 किसान आत्महत्याएं हुई हैं? यह राज्य के कृषि विकास दर की बेबुनियाद बढ़त की पोल खोलता है। छत्तीस गढ़ का एक कटु सत्य है कि वहाँ के खेतिहर किसान आर्थिक विपन्नता के कारण देश के अन्य हिस्सों में मजदूरी के लिए पलायन कर रहे हैं। दूसरी ओर जिस 65 फीसदी बजट को राज्य स्वयं जुटाने की बात कर रहा है उसकी भी सच्चाई उजागर की जानी चाहिए। क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि इस 65 फीसदी हिस्सेदारी में एक बड़ा हिस्सा राज्य के निगमीकरण के कारण प्राप्त हो रहा है। राज्यों के खनिजों के दोहन के लिए निगमों द्वारा प्रदान किया जा रहा है। आखिर जब राज्य अपने बजट का 45 फीसदी हिस्सा आदिवासियों और अनुसूचित जन जातियों पर खर्च कर रहा है तो फिर क्यों आज बिहार और उत्तर प्रदेश की बजाय छत्तीसगढ़ की आबादी रोजगार के लिए पर-प्रान्तों की ओर पलायन कर रही है।
रमन सिंह का पूरा इशारा शांति और तथाकथित विकास के आलाप की ओर है। लेकिन शांति का आधार क्या? राज्य के आलोकतांत्रिक रवैये की तरफ ध्यान न दिया जाना या हर हाल में सिर्फ और सिर्फ चुप रहना। राज्य के नागरिकों में रमन सिंह सरकार को लेकर जैसा लोकतान्त्रिक भय बना हुआ है क्या वह किसी भी ढंग से जनतंत्र के लिए शुभ कदम माना जाएगा। क्योंकि असहमति को राज्य सीधे तौर पर देशद्रोह की कृत्यों के साथ जोड़ कर देख रही है। सरकार का नक्सलियों पर यह आरोप कि वह राज्य में आदिवासी बच्चों को 12 साल की उम्र में बंदूक पकड़ा देती है तो रमन सरकार भी इस आरोप से नहीं उबर सकती कि उसने सलवा जुड़ूम के नाम पर हजारों नाबालिक आदिवासियों को कलम और किताबें देने की बजाय बंदूके पकड़ाकर कभी न थमने वाले हिंसा के रसातल में धकेला है। पिछले सात सालों में गतिरोध को कम करने की बजाय दमनकारी और ध्वंसात्मक तरीके से इसे बढ़ाने का ही काम किया। दरअसल राज्य में जन विरोधी विचारधारा के प्रति संवेदना रखना, राज्य की असंवैधानिक कार्रवाइयों के खिलाफ असहमति व्यक्त करना छत्तीसगढ़ी होने का राजकीय अभिशाप है ।
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अनुज शुक्ला –
सरकारी आयोगों की कार्यप्रणालियां हमेशा शक के दायरे में रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर जितने भी आयोग गठित किए गए हैं, उनकी कार्य प्रविधि सत्ताधारी वर्ग के अनुकूल रही है। वह चाहे मानवाधिकार आयोग हो, एससी-एसटी आयोग या अल्पसंख्यक आयोग। राष्ट्रीय महिला आयोग भी इसका अपवाद नहीं। आधी आबादी के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन किया गया था। बीते वर्षों की काल अवधि गवाह है कि कैसे एक आयोग कस्बाई राजनीति के सर्कस का विदूसक बन चुका है।
आजादी के बाद से स्त्रीवादी कार्यकर्ता, महिलाओं के अधिकारों के सुरक्षा की व्यापक मांग करते आ रहे थे। 1990 के महिला सरंक्षण अधिनियम के तहत 1992 राष्ट्रीय में महिला आयोग की स्थापना की गई। महिला आयोग ने अपनी स्थापना के वक्त जारी घोषणा पत्र में स्त्री की स्वतंत्रता और सुरक्षा का जिक्र किया है। आयोग का मानना था कि अधिकांशतः स्त्री उत्पीड़न ऐसी जगहों पर फलीभूत होता है जहां स्त्रियॉं के सामाजिक – सांस्कृतिक अधिकारों की मनाही की जाती है। लोकतांत्रिक सिविल स्वतंत्रता कहती है कि स्त्री अधिकार मानव की अनिवार्य महत्ता को पहचान देते हैं। जाहिर है आयोग की भूमिका जवाबदेह और पारदर्शी होनी चाहिए। दुर्भाग्य से सिक्के का दूसरा पहलू भी है। पिछले वर्षों में ऐसा कई बार हुआ जब मामलों पर महिला आयोग की भूमिका को देखकर लगा कि अधिनियम में जो बातें कहीं गई हैं उसका अनुशरण खुद आयोग ही नहीं करता। उसकी रिपोर्टे सत्ता – सापेक्ष रही पाई गई।
बहरहाल महिला आयोग की प्रासंगिकता और राजनीति को समझने के लिए दिल्ली और उत्तर प्रदेश से बेहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता। खासतौर से उत्तर प्रदेश में घटित महिला उत्पीड़न के मामले यहा की राजनीति के लिए सुरखाब के पर की तरह काम करते आए हैं । 2010 में दिल्ली महिला उत्पीड़न संबंधी 489 मामले दिल्ली पुलिस ने पंजीकृत किया। इसकी संख्या 2009 के 452 के मुक़ाबले ज्यादा थी। जबकि उत्तर प्रदेश में 2009 के साल 429 मामले, जो दिल्ली से कम थे संज्ञान में आए। दूसरी ओर बाल विबाह, भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के साथ होने वाली उत्पीड़न की राज्यवार घटनाओं की राष्ट्रीय दर चौकाने वाली है। राष्ट्रीय अपराध व्यूरो के अनुसार यह उत्तर प्रदेश में 26.3 % है, जो कांग्रेस शासित आंध्र प्रदेश में 30.3% और संप्रग शासित तमिलनाडु में 33.6% से कम है। राजस्थान और हरियाणा की भी महिला उत्पीड़न की दर में बड़ी हिस्सेदारी है। सवाल उठता है कि महिला आयोग की कवायद इन राज्यों में क्यों शून्य है ? क्या सिर्फ इसलिए कि इन राज्यों में कांग्रेस की प्रत्यक्ष या परोक्ष सरकार है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि आयोग सरकारी नियंत्रण से मुक्त नहीं है। संप्रग शासित राज्यों में महिलाओं को लेकर किए जाने वाले उत्पीड़न की दर गैर कांग्रेसी राज्यों के मुक़ाबले कम नहीं रही है । अब जबकि बजट सत्र के कारण लखनऊ की राजनीति गर्म है, लगभग एक महीने बाद दिल्ली में गिरिजा व्यास और महिला आयोग को बांदा के शीलू की फिक्र होती है। क्या महिला आयोग की मौजूदा कवायद राजनीति से अभिप्रेरित नहीं ! सवाल उठना लाज़िमी है कि आखिर महिला आयोग की प्रासंगिकता क्या है?
यह देखने में आया है कि एक लंबे समय से, राष्ट्रीय महिला आयोग का राजनीतिक इस्तेमाल होता आया है। राजग के काल में गुजरात मामलों पर महिला आयोग की भूमिका संदिग्ध थी। महिला आयोग पहले यह मानने को तैयार ही नहीं थी की बलवाइयों ने बलात्कार की घटनाओं को अंजाम दिया है। सामाजिक संगठनों के दबाव से ही कुछेक मामले पंजीकृत हुए। गुजरात दंगे के दौरान महिलाओं से हुए बलात्कार पर स्वतंत्र जांच कमेटी का नेतृत्व करने वाले कमल मित्र चिनाय की रिपोर्ट और महिला आयोग की रिपोर्ट में जबरदस्त अंतर व्याप्त है। तीस्ता शीतलवाड़ या अन्य गैर सरकारी रिपोर्टे, सरकारी रिपोर्टों से भिन्न पाई गई। बलात्कार के दोषी बड़े कारकुनों को बचाने की आयोग ने भरसक कोशिश की थी। जाहिराशेख जैसे मामलों में आयोग की नौटंकिया अलग से शोध का विषय हैं। इशरतजहा के मामले पर महिला आयोग ने चुप्पी धारण कर ली। कश्मीर में आयोग की क्या भूमिका है यह शायद ही किसी को पता हो। आयोगों की कथा-महत्ता वाले ढेरो उदाहरण मिल जाएंगे। मतलब बिलकुल साफ है कि सत्ताधारी दल अपने फायदे की राजनीति के लिए आयोगों का बेजा इस्तेमाल करता है। शायद इसीलिए ही पार्टियां, आयोग के उच्च पदों पर अपने लोगों को बैठाती हैं।
अगर वाकई महिला आयोग स्त्रियॉं की सिविल अधिकारों को लेकर आग्रही है तो उसे शीलू जैसे मामलों पर राजनीति करने से बाज आना चाहिए। यह बिलकुल सही है कि उत्तर प्रदेश में महिला उत्पीड़न या अन्य आपराधिक मामलों में विधायकों और मंत्रियों के द्वारा या अपराध किया गया या अपराध को सरक्षण दिया गया। दरअसल यह तंत्र के विधिक दिवालिएपन का परिणाम है। न सिर्फ महिला आयोग बल्कि ढेर सारे सरकारी आयोगों को लोगो में ‘काहिरामय’ गुस्सा होने से पहले दोषियों को सजा देने एवं न्याय पर सबके अधिकार की व्यवस्था करनी चाहिए।
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अनुज शुक्ला-

अमेरिका में पिछले हफ्ते इमिग्रेशन अधिकारियों ने वीज़ा क़ानून के उल्लंघन के आरोप में वैली विश्वविद्यालय के 18 भारतीय छात्रों के पैरों में इलेक्ट्रॉनिक टैग लगा दिए थे ताकि उनकी हरकत पर नज़र रखी जा सके। यह दुर्व्यहार संबंधी एक नया मामला है जो मध्य पूर्व एशिया में जारी गतिरोध के कारण मीडियाई बहसों में नहीं उभर पाया। बहरहाल इसे यूरोप में जारी अमानवीयता की श्रीखला की नई कड़ी के रूप में ही देखा जाना चाहिए । एशिया और अफ्रीका जैसे तीसरी दुनिया के नागरिकों के साथ यूरोपीय देशों में ऐसा व्यावहार होता आया है। अमेरिका वैश्वीकरण की प्रक्रिया को स्थापित करने वाला बड़ा संवाहक है जो विश्वग्राम की सोच को तो जरूर स्थापित कर रहा है, बावजूद इसके कि रेसलिज़्म सोच अभी तक परिवर्तित नहीं की जा सकी। दुनिया में किसी दूसरे देश के मुक़ाबिल फ्रांस को ज्यादा प्रगतिशील माना जाता है । फिर भी यह बार- बार देखने में आता है कि फ्रांस में गैर फ्रांसीसी धार्मिक और क्षेत्रीय प्रतीकों को लेकर हमेशा तनाव का माहौल बना रहता है। अमेरिका, कनाडा, इग्लैंड और आस्ट्रेलिया में दाढ़ी, पगड़ी, और बुर्का जैसे सांस्कृतिक, भौगोलिक और धार्मिक महत्त्व के प्रतीक हमेशा ही संदेहास्पद स्थिति में देखे जाते हैं। जबकि ‘लोकतान्त्रिक पूंजीवादी व्यवस्था में इंडीजेनस से अलगाव को लेकर ऐसे सांस्कृतिक प्रतीकों को मौजूद रखने की परंपरा का निर्वहन किया जाता है’। ऐसा नहीं है कि यह 9/11 के तथाकथित इस्लामिक आतंकी हमले के बाद होता आया है, बल्कि यूरोप में धार्मिक अस्मिता के करिश्माई प्रभाव को लेकर अतीत में कई प्रकार के संघर्ष होते रहे हैं। दूसरे विश्व युद्ध की विभीषिका के आधार में तो क्षेत्रीय, नस्लीय और धार्मिक प्रभुसत्ता एक बड़ा कारक साबित हो चुकी है। अब सवाल पैदा होता है कि क्या वाकई मौजूदा मामला भी इन्हीं कारकों के मूल से जुड़ा हुआ है या इसके तार कहीं और जाकर जुड़ते हैं? मौजूदा मामला अन्य दूसरे पक्षों की पड़ताल की अपेक्षा करता है।
दरअसल वैली विश्वविद्यालय जैसे प्रकरणों के मूल में पहली दुनिया और तीसरी दुनिया को परस्पर देखने, समझने के दृष्टिकोण की है। अपने खुद के हित के टकराव की भी। जाहिर है राजनीति के अलावे आर्थिक हित भी होंगे। उदारीकरण के बाद यूरोप में एशियाईयों के साथ होने वाले दुर्व्यहार को, डायस्पोरा में व्याप्त अंतरसंघर्ष से जोड़कर देखा जाता है। तर्क दिया जाता है कि यूरोप में शिक्षाटन के लिए कौन लोग जाते हैं? जाहिर सी बात है कि इसमें वे अधिकांश लोग महानगरों के उस समाज से होते हैं जो काले शीशे वाली गाड़ियों में महिलाओं के साथ बदसलूकी के लिए चिन्हित हैं। यानी वहाँ जाने वाले लोगों की अंतर्दृष्टि, भौगोलिक अंतर के बावजूद ठस कस्बाई ही रहती है। एक हद तक कुछ मामलों में इसे सही भी माना जा सकता है। लेकिन क्या इसे तार्किक कसौटी पर कसते हुए सही कहा जा सकता है? दुनिया की आर्थिक और सामाजिक रूपरेखा प्रस्तुत करने वाले कार्ल मार्क्स ने पूंजी और श्रम का विभाजन करते हुए ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ का नारा दिया। आज की पूंजी की राजनीति कहती है कि श्रमिक को हमेशा बाहरी होना चाहिए। यह इसलिए ताकि श्रमिकों का व्यवस्था पर राजनीतिक दबाव न पड़े। यानी ऐसी व्यवस्था हो जिसमें प्रवासी श्रमिक लोकल मिल मालिक और राज्य पर दबाव न बना पायें। पूंजी का चरित्र होता है समकेंद्रित करना। यानी लगातार यह कोशिश कि पूंजी परिधि के तरफ नहीं फैले। नेटिव इंडीजीनियस- जो यह नहीं समझते कि हम उनके खिलाफ क्यों हैं? अगर देखा जाये तो विकसित देशों का व्यापार, उत्पादन से लेकर विपणन तक तीसरी दुनिया के देशों पर आश्रित है। ठीक उसी तरह जैसे मुंबई, दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों का उत्पादन हिन्दी पट्टी के श्रमिकों पर आधारित है। और इन महानगरों में भी नेटिव इंडीजीनियस द्वारा वैसी ही घटनाएँ देखने को मिलती हैं जैसाकि यूरोपीय देशों में एशियाइयों के साथ होता आया है। विशेषज्ञों ने पूंजी के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण यह आशंका व्यक्त की थी की 2005 से 2020 के बीच में दुनिया के कई हिस्सों में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बदलाव होंगे। इसकी शुरूआत आस्ट्रेलिया की नस्ली वारदातों से मानी जा सकती है। मध्य पूर्व एशिया में मिश्र में राजनीतिक परिवर्तन के मौजूदा संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अरब वर्ल्ड में अवश्यंभावी राजनीतिक बदलाव होंगे। ट्यूनीशिया की आग बाहर तक फैल चुकी है। आर्थिक परिवर्तन में 2007 में शुरू हुई मंदी ने तीसरी दुनिया पर अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है। जबकि आर्थिक विशेषज्ञों का मत था कि भारत इसके प्रभाव से मुक्त रहेगा। भारत पर यह दूसरे तरीके से अपना प्रभाव डाल रहा है। पहले-पहल यूरोपीय राज्यों ने श्रम की आउटसोर्सिंग को बंद किया। और अब यूरोप में रह रहे भारतीयों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। मंदी के कारण बर्बाद हुए अय्याश यूरोपीय मध्य वर्गीय समाज ने अपनी चल-अचल संपत्ति को धड़ल्ले से बेचा। जाहिर सी बात है कि खरीददारों में बड़ी संख्या बचत करने वाले भारतीयों की रही। एशियश की उत्तरोतर प्रगति उस समाज की आँखों में चुभ गई। यह अकारण नहीं है बल्कि यूरोप में इमिग्रेशन टैग जैसे मामले मंदी के बाद ही बढ़े हैं। आने वाले समय में सिर्फ यूरोप में ही नहीं, लगभग दुनिया के हर हिस्से में, भारत में भी इस अव्यवस्थित पूंजीवादी व्यवस्था के कारण मूल निवासियों और प्रवासियों के बीच अंतरसंघर्ष और तेज होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।


बहुत दिनों के बाद नए साल में आज सतीश द्वारा लिखे गए एक लेख से गोपरचनअपनी दूसरी पारी शुरू करने जा रहा है, उनका लेख हमें अभी मिला और वह आपके सामने आपकी पाठकीय प्रतिक्रिया के लिए हाजिर है . आप अगर अपने लेख को गोपरचन पर भेजना चाहते हैं तो हमसे हमारे मेल पर संपर्क किया जा सकता है- मोडरेटर
सतीश-
शायद यह बात मैं नहीं करता लेकिन जबसे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग द्वारा आयोजित मीडिया की राष्ट्रीय संगोष्ठी समाप्त हुई है विश्वविद्यालय के तमाम छात्र छात्राओं के जबान पर सिर्फ कम्युनिटी रेडियो छाया हुआ है। बात दरअसल यह है कि आगरा विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के विभागाध्यक्ष श्री गिरिजाशंकर जी ने अपने वक्तव्य में कम्युनिटी रेडियो के महत्व को बताते हुए कहा कि आज समाज में कम्युनिटी रेडियो के माध्यम से बुनियादी जरूरतों को रेखांकित किया जा सकता है। यह बात इन्होंने इस तरीके से छात्रांे के सामने रखी कि लोग इसे अच्छी तरह समझ ही नहीं सके या उनकी इस बात को मजाक में लिया जाने लगाा। आज कोई भी समस्या का वास्तविक समाधान कम्युनिटी रेडियो ही है। अगर कही किसी भी प्रकार की कोई समस्या आती है तो उसे कम्युनिटी रेडियो के माध्यम से पहुंचाया जा सकता है। कम्युनिटी रेडियो किसी भी समस्या और जानकारी को संप्रेषित करने के लिए बेहतर माध्यम हो सकता है । वास्तव में छोटी – छोटी बातों के लिए कम्युनिटी रेडियो का सहारा लेना उचित है। बात दीगर है कि उनकी बात को हास्पयद तरीके से लिया गया। आवश्यकता इसके प्रसार की है.
पुरे देश में घोटालो और भष्ट्राचार का दौर चल पडा है पुरी मीडिया इन्हें उजागर करने में जी जान से लगी पडी है। फिर भी समाज इन घटनाओं के प्रति जागरूकता दिखाई पड रही है। शायद गिरिजाशंकर जी सही ही कह रहे थे कि यदि कम्युनिटी रेडियो के माध्यम से इन सूचनाओं को संप्रेषित किया जायगा तो लोग काफी जागरूक होंगे। मैं भी देखना चाहता हुं कि वाकई में कम्युनिटी रेडियो लगाने से क्या हमारे यहां की समस्या समाप्त हो जाएगी?
अन्त में मैं बस इतना ही कहुंगा कि कम्युनिटी रेडियो के न होने से ही शायद आज भारत इतना पिछडा है। फरवरी आने वाला है क्या बसंत में भी इसका इस्तेमाल संभव है?


-दिलीप ख़ान

फ़्रांस में जिस दिन सेवानिवृत्ति की न्यूनतम उम्र बढाने के सरकारी फ़ैसले के ख़िलाफ़ लोग सड़क पर उतरे, उससे दो-एक दिन पहले अमेरिका, इंग्लैंड और फ़्रांस सहित अन्य दस यूरोपीय देशों में हुए सर्वे के हवाले से एक शोध पत्र प्रस्तुत हुआ. इस शोध पत्र में बताया गया कि सेवानिवृत्ति के साथ ही लोग मानसिक तौर पर भी ’सेवानिवृत्त’ हो जाते हैं, इसलिए बुजुर्ग, यदि अपने मस्तिष्क को चलायमान रखना चाहते हैं तो उन्हें अधिक उम्र तक काम करना चाहिए. इस शोध रिपोर्ट को यूरोप, और अमेरिका के कई अख़बारों ने प्रमुखता से छापा. ऐसी रिपोर्टों को लेकर अब यह साफ़ होता जा रहा है कि ये राजसत्ता के फ़ैसले को या तो एक मज़बूत पृष्ठभूमि देती हैं या फ़िर उनके फ़ैसले को वैज्ञानिकता का लबादा पहनाती हैं. फ़्रांस के संदर्भ में निकोलस सरकोजी के फ़ैसले को यह अकादमिक और वैज्ञानिक शोध-प्रणाली के जरिए समर्थन दे रही है. सरकोजी सरकार ने सेवामुक्ति के लिए न्यूनतम उम्र को ६० से बढ़ाकर ६२ करने की योजना बनाई है. युवा-वर्ग इसे बेरोजगारी की दर को और बढाने वाला कदम मान विरोध कर रहा है. सरकार का तर्क है कि देश में सक्रिय कामकाजी लोगों के मुक़ाबले सेवानिवृत्तों की संख्या लगातार बढ रही है और इससे देश पर ॠण का भार बढता जा रहा है. १९४५ में जब इस नियम को अपनाया गया था तो उस समय चार कामकाजी लोगों पर एक सेवानिवृत्त का अनुपात था. अब यह घटकर चार के मुक़ाबले डेढ रह गया है. सरकार ने दूसरा तथ्य यह दिया है कि उस समय की तुलना में फ़्रांस का एक औसत नागरिक अब १५ साल अधिक जीता है. इसका मतलब यह हुआ कि फ़्रांस सरकार काम करने की क्षमता के लिए किसी ख़ास उम्र को पैमाना नहीं बना रही है बल्कि यह लोगों के मृत्यु से १० साल या २० साल पहले सेवानिवृत्त होने के दलील को सामने रख रही है. इसीलिए सरकार ने २०१७ तक सेवानिवृत्ति के लिए न्यूनतम उम्र को बढाकर ६७ करने की योजना भी सामने रखी है. इससे पहले एक वैज्ञानिक शोध इस आशय का भी हुआ था कि काम करने की क्षमता उम्र बढने के साथ-साथ घटती जाती है. अब इन दोनों शोध में से लोग किसे ठीक माने, यह एक सवाल है, लेकिन इससे यह तो स्पष्ट होने लगा है कि शोध की भी अपनी एक राजनीति है.

यह राजनीति राज्य की बात को मज़बूती प्रदान करने की है और उसे ऐसी शक्ति प्रदान करने की है जिसके बदौलत सरकार इसके विरोध में उठने वाली आवाज़ को कमज़ोर करने के लिए कोई भी क़दम उठा सके. निकोलस सरकोजी ने मौजूदा प्रदर्शनों को लेकर इस आशय की बात कहीं कि लोकतंत्र में लोगों के पास अपने को अभिव्यक्त करने का पूरा हक़ है लेकिन वे अधिक उत्तेजित और अनियंत्रित नहीं हो सकते…… और यह प्रदर्शन कुछ संख्या में अराजक तत्त्वों के इसमें शामिल होने का नतीजा हैं, उनसे पार पा लिया जाएगा. एक ऐसे समय में, जब दुनिया भर में सत्ता के विरोध में होने वाले प्रदर्शनों को लगातार सीमित किया जा रहा है और ज़्यादातर मौक़ों पर शासनतंत्र उन्हें अनसुना करने की हरसंभव कोशिश करता है, लोग अपने विरोध को एक ’लोकतांत्रिक देश’ में कैसे व्यक्त करे, यह महत्त्वपूर्ण हो जाता है. हर प्रदर्शन को अराजक या फ़िर ’दिक्कत पैदा करने वाले समूह’ के रूप में स्थापित करने की नियोजित कोशिश हो रही है. इनसे पार पाने के लिए राज्य के पास कई तरीके मौजूद हैं. एक तरीका तो इन प्रदर्शनों पर चुप्पी साध लेना है. ’कुछ नहीं’ करना है. लेकिन अगर प्रदर्शन का दबाव अधिक हो तो यह तरीका कारगर नहीं होता; ऐसे में पार पाने के अन्य तरीकों पर राज्य को विचार करना पड़ता है. पार पाने की प्रक्रिया में राज्य जब उत्तेजित और अनियंत्रित होता है तो वह इसे लोकतंत्र स्थापना के लिए किए गए प्रयास का हिस्सा मानता है. इसका मतलब यह हुआ कि राजसत्ता की मशीनरी की उत्तेजना और प्रदर्शनकारी समूह की उत्तेजना में और उनके अभिव्यक्ति में समानता नहीं है. समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के नारे पर स्थापित हुए फ़्रांस के महान लोकतंत्र में लोकतंत्र की परिभाषा में आ रहे क्रमिक बदलाव का यह अगला चरण है. फ़्रांस में लोकतंत्र स्थिति को बहाल करने के लिए सरकोजी ने दूसरे रास्ते पर भरोसा जताया है. दरअसल पूरी दुनिया में लोकतंत्र अब बहाल करने की वस्तु में परिवर्तित हो गई है. भीतरी लोकतंत्र लगातार खोखला हुआ है. लोकतंत्र बहाली के क्रम में अपनी बातों को सफ़लता से लोगों के बीच ले जाने के लिए राज्य सर्वे, शोध जैसे तमाम हथकंडों का सहारा लेता है. नए तरीके को विकसित करने के लिए आजकल ’क्राइसिस मैनेजमेंट’ जैसे कोर्स को प्रोत्साहित किया जा रहा है. मीडिया अकादमिक में संकटकालीन जनसंपर्क पढ़ाया जा रहा है. यह इस उम्मीद में पढ़ाया जा रहा है कि ऐसे जनसंपर्क सीखने के बाद प्रशिक्षु संकटमोचक में परिवर्तित हो जाए और मुश्किल हालात में किसी सरकारी संस्थान या किसी कॉरपोरेट कंपनी का वह संकट हर लें.

संपर्क: दिलीप
प्रथम तल्ला, C/2 ,पीपल वाला मोहल्ला,
बादली एक्सटेंशन, दिल्ली-42
मो. – +91 9555045077
E-mail – dilipk.media@gmail.com

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हाल-फिलहाल कश्मीर में जो कुछ देखने को मिल रहा वह चौकाने वाला है। सरकार, विपक्ष और मीडिया सभी की भूमिकाओं पर सवालिया निशान लगा है। साल भर पहले सोफिया प्रकरण पर सरकारी भूमिका के बाद ऐसा लगने लगा था कि वहाँ कोई बड़ी घटना होने वाली है। कई विश्लेषकों ने राय जाहिर की थी ‘जिस तरीके से मामले को गोल मोल किया जा रहा है –भविष्य में स्थिति के बदतर होने में प्रभावी होगी’। आम कश्मीरियों का विश्वास दिल्ली पर से घटता गया और गुस्सा घाटी के पूरे अवाम पर हावी होता गया ।
किसी भी आंदोलन के पीछे कोई फौरी कारण कारगर हो सकता है पर उसकी पृष्ठभूमि में वे तमाम मुद्दे प्रमुख होते हैं जो जनता को सीधे अपील करते हैं। मौजूदा आंदोलन जिसे दिल्ली एक आन्दोलन स्वीकार करने की मनःस्थिति में नहीं दिखता के पीछे भी कई कारण प्रभावी रहे, जो वहाँ की वादियों में पिछले छ दशक से गूंज रही है। दिल्ली इसे अपना अटूट हिस्सा मानती आई है, पर क्या वाकई कश्मीर भारत का हिस्सा है? अगर है तो वहाँ 1958 का विशेष सशस्त्र बल अधिनियम क्यों? जो घाटी के अवाम को उसके लोकतान्त्रिक अधिकारों से दूर करती है, जिसकी आड़ में वहाँ मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाई गयीं, जिसके कारण आम कश्मीरी आज पहचान के संकट से जूझ रहा है । इस अधिनियम की आड़ में कश्मीर में लगातार पैशाचिकता का अंधा कारोबार किया गया। हकीकत यह है कि आजादी के साठ साल बीत जाने के बावजूद एक कश्मीरी न तो भारतीय बन पाया और न ही कश्मीरी। वह पाकिस्तानी, आतंकी और मुजाहिद के रूप में प्रचार पाता रहा, जिसे दिल्ली की सियासत करने वाले दल और मीडिया प्रचारित करते रहें।
उस विश्वास का आधार कहाँ है जिसके बल पर नेहरू 1953 में ताल ठोककर कश्मीर में जनमत करवाने की चुनौती देते रहें थे। इन साठ सालों में वहाँ कौन सी हवा चली जिससे कश्मीर जलता ही गया और दिल्ली बेफिक्र रही। अबकी कश्मीर की सड़कों पर मूलभूत नागरिक अधिकार की मांग करने वाले कश्मीरियों के सवाल के जवाब मे बराबर प्रचारित किया जाता रहा कि यह भीड़ पाकिस्तान के इशारे पर नाच रही है, दिल्ली और स्थानीय प्रशासन अपनी खामी ढूढ़ने के बजाय इसे अलगाववादियों और विदेशी साजिश का हिस्सा मानता रहा। उन्हें इतना अंदाजा भी नहीं हुआ कि यह अवाम जो सड़क पर उतरी है इसके पीछे राजनीतिक दलों की सोच की अपेक्षा आम अवाम की दुश्वारियां ज्यादा काम कर रहीं हैं।
दिन सरकता रहा और लोग मरते रहें। दिल्ली उमर अब्दुल्ला के सहारे बेफिक्र बैठी रही। उमर जिन्हें कश्मीर पर ज्यादा विश्वास रहा और जो कश्मीरी राजनीति को अपनी पैतृक संपत्ति मान बैठे हैं। अगर उमर ने शुरूआत में ही, राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया होता तो शायद बात आगे नहीं बढ़ती। किंतु कश्मीर के राजनीति पर नियंत्रण को लेकर उन्होने वहाँ की अवाम, हुर्रियत और पीडीपी से ठोस और सीधी वार्ता की पहल नहीं की। इन्हें तवज्जो न देने के पीछे शायद उनका यह डर हो सकता है कि कहीं घात लगाकर बैठी महबूबा मुफ्ती इस अवसर का इस्तेमाल न कर लें। पूरे मामले में उमर का रवैया दिल्ली के साथ ऐसा बना रहा कि हुर्रियत या मुफ्ती की भूमिका नगण्य रहे ताकि दिल्ली पर उनका राजनीतिक दबदबा बना रहे। कमोबेश स्थानीय कांग्रेसी स्थिति भी यही रही जिसमें अन्य पक्षों की भूमिका को शून्य कर दिया जाय । कश्मीर में इन लोगों को इतनी भयावहता का अंदाजा नहीं था। जैसे-जैसे मामला बिगड़ता गया और दिल्ली का उमर से विश्वास जाता रहा अन्य विकल्पों में संभावना तलाश की गयी।
अब सर्वदलीय बैठक और डेलीगेशन के माध्यम से डैमेज कंट्रोल का प्रयास किया जा रहा है। कश्मीर की मौजूदा हिंसा के इस लंबे सत्र में 20 सितंबर को डेलीगेशन में मीरवाइज़ का यह बयान महत्त्वपूर्ण है कि ‘भारत सरकार एक तरफ हमसे बातचीत करना चाहती है, वही दूसरी ओर हमें घरों में नजरबंद किया गया है’ वाकई कैसे अंदाजा लगाया जाए कि यह विश्वासपूर्ण माहौल में ठोस बातचीत का आधार होगा। गेंद अब दिल्ली के पाले में है और उसे ही तय करना है कि कश्मीर में लोकतन्त्र कितना मजबूत होगा और एक आम कश्मीरी क्या वाकई भारतीय बन पाने में सफल होगा।


बिहार के घमासान पर रत्नेश अपनी राजनीतिक टिप्पणियों के साथ गोपरचन पर आए है, और उन्होने वहाँ के हालात का जायजा लिया है साथ ही नित हो रहे बयानों और उनके पीछे की साजिश को उजागर करने का प्रयास किया है आपकी प्रतिक्रिया गोपरचन के भविष्य के लिए आवश्यक है- माडरेटर  

रत्नेश कुमार मिश्र

        बिहार में चुनावी सावन आ गया है। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने वोटबैंक के साजिश में लगे हुए हैं। आत्मप्रशंसा, आरोप प्रत्यारोप और झठे तुष्टीकरण की एक लहर सी आ गई है।इस बीच अखबारों में खबर आई कि एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने नीतीश सरकार को आड़े हाथों लिया। जाहिर है कि बिहार में विधान सभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस अपने चुनावी एजेण्डे के निर्धारण में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती। ऐसे में बिहार में केंद्र सरकार द्वारा दी गई धनराशि का हिसाब मांगना जायज है, इसके अलावा कांग्रेस के पास कोई चारा नहीं है। अब देखना यह है कि नीतीश सरकार कौन सी सियासी चाल चलती है। चोर-चोर मौसेरे भाई वाली कहावत दोनों पार्टियों के लिए सटीक साबित हो रही है।

        केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस और उसके घटक दल भी दूध के धुले हुए तो कदापि नहीं है। पहले आईपीएल फिर मनरेगा और अब राष्ट्रमण्डल जैसे भ्रष्टाचार के गहरे दलदल में फंसी यूपीए सरकार देश में विकास के अपने मनमाफिक कसीदे पढ़ रही है। धन की लूट खसोट में कौन अव्वल रहा इस नतीजे पर पहुंचना जरा मुश्किल है। विकास और प्रगति के नाम पर चुनावी अखाड़ों में ताल ठोंकने वाली राजनीतिक पार्टियों को यह बात कब समझ में आएगी कि इस मुहावरे में अब दम नहीं रहा। देश की जनता मंहगाई और बेरोजगारी की चपेट में है। गरीबी और भुखमरी की स्थितियाँ दिनों-दिन बढ़ती जा रही हैं। भ्रष्टाचार के पैमाने में लगातार वृद्धि हो रही है। 2005 में अपनी ईमानदार छवि के चलते सत्ता में आए नीतीश कुमार हजारों करोड़ गटक लिए और डकार तक नहीं ली। बिहार पांच साल पहले जहां खड़ा था वही अब भी है। हां यह जरूर हुआ कि सत्ता प्रतिष्ठान के कुछ चाटुकार पूंजीपतियों का विकास अवश्य हुआ। लिहाजा कांग्रेस और नीतीश सरकार दोनों एक ही धरातल पर खड़े हैं। अभी कुछ ही दिनों पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया कि सरकारी गोदामों में खुले आसमान के नीचे अनाज को सड़ने से अच्छा होगा कि उसे देश की भूखी, गरीब जनता में मुफ्त बांट दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश पर प्रतिक्रिया देते हुए कृषिमंत्री शरद पवार ने कहा कि इस पर अमल संभव नहीं है। जिस देश में दुनिया की अधिकतम भूख और कुपोषण की शिकार जनता निवास कर रही हो, वहाँ खाद्यान का सड़ जाना कितना बड़ा नैतिक अपराध है, शायद इसका एहसास कांग्रेस को नहीं है। वोटबैंक की गुणागणित में तल्लीन श्रीमती सोनिया गांधी और यूपीए सरकार अबतक मंहगाई का विकल्प सोचने में नाकामयाब रही है उनके विकास और प्रगति के राष्ट्रमण्डल में हजारों करोड़ो के  वारे – न्यारे हो गए। ऐसे में देखना यह है कि नीतीश कुमार एक बार फिर अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब होते है या नहीं। बिहार की जनता को यह तय करना होगा कि इन सियासी दलों की लोकलुभावनी घोषणाओं के बीच अगले पांच सालों के लिए अपना भविष्य किसके हाथ सौंपती है। बिहार भूंखा है उसे रोटी चाहिए, नौजवान बेरोजगार हैं उन्हें रोजगार चाहिए। रानेताओं द्वारा खाए, पचाए और अघाए माल के  दस्तावेजों की जांच सख्ती से होना चाहिए, इसे चुनाव का मुद्दा या यू कहें कि जनता का मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। सियासी डलों को जनता की वास्तविक जरूरतों पर राजनीति के बजाय वोटबैंक की साजिश ही दिखाई देती है। इधर केंद्र में प्रमुख विपक्षी की भूमिका निभाने वाली और बिहार में नीतीश के साथ मिल कर चुनाव लड़ने वाले भाजपा ने सीधे कांग्रेस पर निशाना साधा है।  भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी इस बात की मांग को लेकर अडिग है कि राष्ट्रमण्डल खेलों में हुए करोड़ों रूपए के घोटाले की संसदीय समिति के द्वारा जांच होनी चाहिए। गडकरी का इशारा सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरफ है। पास किए गए रूपयों की विभिन्न मदों में खर्च की जांच ठीक ढंग से हुए बिना उन्होंने हस्ताक्षर कैसे किए । विदित है कि अभी कुछ ही दिनों पहले भाजपा के ही एक बड़े नेता और गुजरात के वर्तमान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नीतीश कुमार की तस्वीर को अखबारों में विज्ञापित करने पर नीतीश कुमार ने कड़ी आपत्ति जाहीर की थी। लेकिन साथ-साथ चुनाव लड़ने में कोई आपत्ति नहीं है। नीतीश कांग्रेस और भाजपा पैतरे बाजी के अतिरिक्त लालू और पासवान जैसे दिग्गज भी अपनी कोर-कसर नहीं छोड़ने वाले हैं। इन राजनीतिक चुहलबाजियों के बीच जनता का फैसला आना बाकी है।       

       लेखक मीडिया के शोधार्थी हैं उनसे Ratnesh.media@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है


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